व्रत कथा · भगवान विष्णु

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले कि इसका नाम पापमोचनी है, यानी पापों से छुड़ाने वाली, और उन्होंने वह कथा सुनाई जो लोमश ऋषि ने राजा मांधाता को सुनाई थी।

प्राचीन काल में चैत्ररथ नाम का एक सुंदर वन था, जहाँ सदा वसंत रहता था और अप्सराएँ विहार करती थीं। वहीं च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी मुनि, जो शिवजी के भक्त थे, कठोर तपस्या कर रहे थे। कामदेव ने उनका तप भंग करने के लिए मंजुघोषा नाम की अप्सरा को भेजा। वह आश्रम के पास रहकर इतना मधुर गाने लगी कि मुनि का मन उसकी ओर खिंच गया। वे तपस्या भूलकर बरसों उसके साथ रहे, पर उन्हें यह समय थोड़ा-सा ही लगा।

जब मंजुघोषा ने स्वर्ग लौटने की आज्ञा माँगी, तो मुनि ने समय गिना और पाया कि सत्तावन वर्ष बीत चुके हैं। अपना तप नष्ट हुआ देखकर उन्होंने क्रोध में शाप दिया, "तू पिशाचिनी हो जा!" मंजुघोषा काँपती हुई उनके चरणों में गिर पड़ी और शाप से छूटने का उपाय पूछने लगी। शांत होने पर मुनि ने कहा कि चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत करो, इससे तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो जाएँगे।

मेधावी अपने पिता च्यवन ऋषि के आश्रम लौटे और सारी बात बताई। पिता ने कहा कि इस भूल से तुम्हारा तप भी क्षीण हुआ है, इसलिए तुम भी यही व्रत करो। मंजुघोषा ने श्रद्धा से पापमोचनी एकादशी का व्रत किया और शाप से मुक्त होकर दिव्य रूप में स्वर्ग लौट गई। मेधावी ने भी व्रत किया, उनके पाप धुल गए और तप का तेज लौट आया।

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो इस व्रत को करता है या श्रद्धा से यह कथा पढ़ता-सुनता है, वह बड़े से बड़े पापों से भी छूट जाता है।

कथा के बारे में

मेधावी मुनि और अप्सरा मंजुघोषा की कथा, जो श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को यह बताने के लिए सुनाई कि पापमोचनी एकादशी पतन के बाद भी पापों से छुड़ा देती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है।

कब पढ़ें या गाएँ

पूर्णिमांत पंचांग में चैत्र कृष्ण एकादशी (अमांत पंचांग में फाल्गुन कृष्ण एकादशी), हिंदू नववर्ष से पहले की अंतिम एकादशी, मार्च या अप्रैल में। व्रत के दिन पूजा में यह कथा पढ़ी जाती है।

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