व्रत कथा · भगवान विष्णु
कामदा एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण ने वह कथा सुनाई जो वशिष्ठ मुनि ने श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप को सुनाई थी।
प्राचीन काल में नागराज पुंडरीक एक वैभवशाली नगर में राज करते थे, जहाँ उनकी सभा में गंधर्व, किन्नर और अप्सराएँ गाते-नाचते थे। उनमें ललित नाम का गंधर्व और उसकी पत्नी ललिता भी थे, जिनमें बड़ा प्रेम था। एक दिन ललिता सभा में नहीं थी और ललित राजा के सामने गा रहा था। पत्नी की याद आने से उसका सुर और ताल बिगड़ गया। कर्कोटक नाग ने यह देख लिया और राजा से कह दिया।
पुंडरीक ने क्रोध में ललित को शाप दिया, "तू मेरी सभा में भी पत्नी का ध्यान करता है, इसलिए नरभक्षी राक्षस बन जा!" उसी क्षण ललित विशाल और भयानक राक्षस बन गया और दुःख भोगता हुआ वनों में भटकने लगा।
ललिता बहुत दुखी हुई और पति के पीछे-पीछे वनों में घूमती रही। अंत में वह विंध्य पर्वत पर श्रृंगी ऋषि के आश्रम पहुँची और पति की मुक्ति का उपाय पूछा। ऋषि ने कहा कि चैत्र शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी आने वाली है। "उसका व्रत श्रद्धा से करो और उसका पुण्य अपने पति को दे दो, शाप छूट जाएगा।"
ललिता ने पूरी श्रद्धा से कामदा एकादशी का व्रत किया। द्वादशी के दिन ऋषि के सामने भगवान विष्णु से प्रार्थना करके उसने व्रत का पुण्य पति को अर्पित कर दिया। उसी क्षण ललित शाप से छूट गया और उसे फिर से सुंदर गंधर्व रूप मिल गया। दोनों दिव्य विमान में बैठकर स्वर्गलोक चले गए।
वशिष्ठ जी ने दिलीप से कहा कि यह एकादशी ब्रह्महत्या जैसे पाप को भी नष्ट कर देती है और राक्षस योनि से छुड़ाती है, और इसकी कथा सुनने से भी बड़ा पुण्य मिलता है।
कथा के बारे में
गंधर्व ललित और उसकी पत्नी ललिता की कथा, जो वशिष्ठ मुनि ने राजा दिलीप को सुनाई। हिंदू वर्ष की पहली एकादशी, कामदा एकादशी, मनोकामनाएँ पूरी करने वाली और शाप तक से मुक्ति देने वाली मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है।
कब पढ़ें या गाएँ
चैत्र शुक्ल एकादशी (पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में यही महीना), राम नवमी के कुछ दिन बाद, मार्च या अप्रैल में।