व्रत कथा · भगवान विष्णु
अपरा एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले कि इसका नाम अपरा है, क्योंकि इसका पुण्य अपार है, और यह परनिंदा, झूठी गवाही और छल जैसे पापों से भी मुक्त करती है। फिर उन्होंने यह कथा सुनाई।
प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। उनका छोटा भाई वज्रध्वज क्रूर और अन्यायी था और ईर्ष्या के कारण बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक रात वज्रध्वज ने बड़े भाई की हत्या कर दी और शव को वन में एक पीपल के पेड़ के नीचे चुपचाप गाड़ दिया।
अकाल मृत्यु के कारण राजा की आत्मा को शांति नहीं मिली और वह प्रेत बनकर उसी पीपल पर रहने लगी। उस रास्ते से जो भी गुजरता, प्रेत उसे सताता।
एक दिन धौम्य ऋषि उस मार्ग से निकले। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से राजा के जीवन और मृत्यु की पूरी कथा जान ली। करुणा से भरकर ऋषि ने प्रेत को पेड़ से उतारा और उसे मुक्ति का मार्ग बताया।
राजा के उद्धार के लिए धौम्य ऋषि ने स्वयं श्रद्धा से अपरा एकादशी का व्रत किया और द्वादशी के दिन उसका पुण्य प्रेत को दे दिया। उस पुण्य से राजा प्रेत योनि से छूट गए। उन्होंने दिव्य शरीर पाया, ऋषि को धन्यवाद दिया और दिव्य विमान में बैठकर स्वर्ग चले गए।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि इस व्रत से पवित्र नदियों में स्नान और बड़े दान के बराबर पुण्य मिलता है, और जो यह कथा पढ़ता या सुनता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है।
कथा के बारे में
भाई के हाथों मारे गए राजा महीध्वज की कथा, जिन्हें अपरा एकादशी के पुण्य से प्रेत योनि से मुक्ति मिली। 'अपरा' का अर्थ है अपार, क्योंकि इस व्रत का पुण्य अपार माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है।
कब पढ़ें या गाएँ
पूर्णिमांत पंचांग में ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी (अमांत पंचांग में वैशाख कृष्ण एकादशी), मई या जून में।