व्रत कथा · भगवान विष्णु
श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले कि इसका नाम पुत्रदा है, यानी पुत्र देने वाली, और उन्होंने यह कथा सुनाई।
द्वापर युग में माहिष्मती नगरी में राजा महीजित राज करते थे। वे प्रजा को अपनी संतान की तरह पालते थे, पर उनके कोई पुत्र नहीं था, जिससे वे बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने मंत्रियों और विद्वानों को बुलाकर कहा, "मैंने कभी अन्याय से कुछ नहीं लिया और धर्म से राज किया है। फिर मैं निःसंतान क्यों हूँ?"
उत्तर जानने के लिए मंत्री और प्रजा के बड़े-बूढ़े वन में किसी ऐसे ऋषि को खोजने निकले जो इसका कारण बता सके। उन्हें भूत और भविष्य के ज्ञाता महर्षि लोमश मिले, और उन्होंने ऋषि को राजा का दुःख बताया।
लोमश ऋषि ने आँखें बंद करके राजा का पिछला जन्म देखा और कहा, "पिछले जन्म में राजा एक निर्धन वैश्य थे। एक बार ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को व्यापार के लिए जाते हुए, दिन भर भूखे-प्यासे रहने के बाद वे एक तालाब पर पहुँचे। तभी हाल ही में ब्याई एक गाय गर्मी से प्यासी होकर वहाँ पानी पीने आई। उन्होंने गाय को हटा दिया और स्वयं पानी पी लिया। प्यासी गाय को पानी से रोकने के कारण वे इस जन्म में निःसंतान हैं, यद्यपि अपने दूसरे पुण्यों से राजा बने।"
मंत्रियों ने इस दोष को दूर करने का उपाय पूछा। ऋषि बोले, "श्रावण शुक्ल पक्ष में पुत्रदा एकादशी आती है। आप सब प्रजा के साथ श्रद्धा से उसका व्रत करें, रात भर जागरण करें और उसका पुण्य राजा को दे दें। तब उन्हें अवश्य पुत्र होगा।"
मंत्रियों और प्रजा ने ऋषि के कहे अनुसार व्रत करके उसका पुण्य राजा को अर्पित कर दिया। उसके प्रभाव से रानी गर्भवती हुईं और समय पर एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ।
श्रीकृष्ण ने कहा कि जो यह व्रत करता है, उसे इस लोक में संतान और सुख तथा परलोक में स्वर्ग मिलता है।
कथा के बारे में
माहिष्मती के राजा महीजित की कथा, जिन्हें लोमश ऋषि के कहने पर प्रजा द्वारा किए गए इस व्रत से पुत्र मिला। संतान की कामना रखने वाले दंपती यह व्रत करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है। इसे पवित्रा एकादशी भी कहते हैं।
कब पढ़ें या गाएँ
श्रावण शुक्ल एकादशी (पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में यही महीना), रक्षाबंधन से कुछ दिन पहले, जुलाई या अगस्त में। दूसरी पुत्रदा एकादशी पौष में आती है।