व्रत कथा · भगवान विष्णु
देवउठनी एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण ने वह बताया जो ब्रह्मा जी ने नारद जी से कहा था: इस एकादशी का नाम प्रबोधिनी है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु उस योगनिद्रा से जागते हैं जो उन्होंने चार महीने पहले देवशयनी एकादशी को आरंभ की थी। इसके व्रत से हज़ार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञों का फल मिलता है, और इसकी रात भगवान का नाम गाते हुए जागरण करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं।
इस दिन घरों में सबसे अधिक यह कथा सुनाई जाती है। एक राजा के राज्य में सभी एकादशी का व्रत करते थे, और एकादशी के दिन किसी को, पशुओं तक को, अन्न नहीं दिया जाता था। एक दिन दूसरे देश का एक व्यक्ति राजा के दरबार में नौकरी माँगने आया। राजा ने कहा, "नौकरी मिल जाएगी, पर एकादशी को अन्न खाने को नहीं मिलेगा।" उस व्यक्ति ने हामी भर दी।
एकादशी आई तो उसे अन्न की जगह फल दिए गए। वह राजा के पास जाकर गिड़गिड़ाया, "फलों से मेरा पेट नहीं भरेगा, मैं भूख से मर जाऊँगा। मुझे अन्न दे दीजिए।" राजा ने उसे शर्त याद दिलाई, पर वह बार-बार विनती करता रहा, तो अंत में राजा ने उसे आटा, दाल और चावल दिलवा दिए। वह नदी किनारे गया, स्नान किया और भोजन बनाया। फिर अपने स्वभाव के अनुसार उसने पुकारा, "आओ भगवान, भोजन तैयार है।" पीतांबर पहने चतुर्भुज भगवान विष्णु आए, प्रेम से उसके साथ भोजन किया और चले गए।
अगली एकादशी को उसने दोगुना अन्न माँगा और कहा, "पिछली बार भगवान ने मेरे साथ भोजन किया, तो मैं भूखा रह गया।" राजा को विश्वास नहीं हुआ कि भगवान उसके साथ भोजन करने आते हैं, और वे स्वयं देखने के लिए साथ जाकर एक पेड़ के पीछे छिप गए। उस व्यक्ति ने भोजन बनाकर भगवान को बार-बार पुकारा, पर भगवान नहीं आए। अंत में उसने कहा, "यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में प्राण दे दूँगा," और पानी की ओर बढ़ा। तभी भगवान प्रकट हुए, उसे रोका, बैठकर उसके साथ भोजन किया और उसे अपने धाम ले गए।
राजा समझ गए कि भगवान केवल उपवास से नहीं, सच्चे और प्रेम भरे मन से मिलते हैं। उसके बाद वे सच्ची भक्ति से व्रत करने लगे और अंत में उन्हें भी स्वर्ग मिला।
कथा के बारे में
वह दिन जब भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और चातुर्मास समाप्त होता है; इसे प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं। यहाँ ब्रह्मा जी द्वारा बताई गई इसकी महिमा और घरों में सबसे अधिक सुनाई जाने वाली वह कथा है जिसमें एक व्यक्ति ने भगवान को भोजन कराया। इसी समय तुलसी विवाह होता है और विवाह आदि शुभ कार्य फिर शुरू होते हैं।
कब पढ़ें या गाएँ
कार्तिक शुक्ल एकादशी (पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में यही महीना), दिवाली के ग्यारह दिन बाद, अक्टूबर या नवंबर में। शाम को शंख और भजन से भगवान को जगाया जाता है और इसी दिन या द्वादशी को तुलसी विवाह होता है।