व्रत कथा · भगवान विष्णु
जया एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले कि इसका नाम जया है, यह बहुत पवित्र है और भूत-पिशाच योनि से भी मुक्ति देती है, और उन्होंने यह कथा सुनाई।
एक बार स्वर्ग के नंदन वन में इंद्र देवताओं के साथ गीत और नृत्य का आनंद ले रहे थे। गंधर्व गा रहे थे और अप्सराएँ नाच रही थीं। गाने वालों में माल्यवान नाम का गंधर्व था और नाचने वालों में पुष्पवती नाम की अप्सरा। एक-दूसरे को देखकर दोनों का मन ऐसा मोहित हुआ कि गीत का सुर और नृत्य की ताल बिगड़ गई।
इंद्र समझ गए कि उनका गायन-नृत्य क्यों बिगड़ा। उन्हें लगा कि इन्होंने सभा का अपमान किया है, और उन्होंने क्रोध में शाप दिया, "तुमने सभा की मर्यादा तोड़ी है। पृथ्वी पर जाकर पिशाच और पिशाचिनी बनकर पति-पत्नी के रूप में रहो।"
उसी क्षण दोनों पिशाच रूप में हिमालय की एक चोटी पर जा गिरे। वहाँ उन्होंने बहुत कष्ट भोगा। उन्हें न गंध का सुख मिलता, न स्वाद का, और बर्फ की कड़ाके की ठंड उन्हें दिन-रात सताती। वे सो नहीं पाते थे और ठंड से उनके दाँत किटकिटाते रहते।
एक दिन, जो संयोग से माघ मास की जया एकादशी थी, वे इतने दुखी थे कि दिन भर कुछ नहीं खाया। थोड़ा-सा जल पीकर वे एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठे अपनी भूल पर पछताते रहे। उस रात कड़ाके की ठंड में वे सो न सके और पूरी रात जागते रहे। इस तरह अनजाने में उन्होंने जया एकादशी का व्रत और जागरण कर लिया।
उस व्रत के पुण्य और भगवान विष्णु की कृपा से द्वादशी की सुबह वे पिशाच शरीर से मुक्त हो गए और उन्हें फिर सुंदर दिव्य रूप मिल गया। दिव्य विमान उन्हें लेने आया और वे स्वर्ग लौट गए। इंद्र चकित हुए और पूछा कि तुम इतनी जल्दी कैसे मुक्त हो गए। उन्होंने बताया कि यह जया एकादशी के प्रभाव और भगवान विष्णु की कृपा से हुआ।
श्रीकृष्ण ने कहा कि जो यह व्रत करता है वह पिशाच योनि से मुक्त रहता है, और जो यह कथा पढ़ता या सुनता है उसे यज्ञ का फल मिलता है।
कथा के बारे में
गंधर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पवती की कथा, जिन्हें इंद्र ने पिशाच होने का शाप दिया और जो अनजाने में यह व्रत करके मुक्त हुए। माना जाता है कि यह व्रत भूत-प्रेत और पिशाच योनि से मुक्ति देता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है।
कब पढ़ें या गाएँ
माघ शुक्ल एकादशी (पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में यही महीना), वसंत पंचमी के कुछ दिन बाद, जनवरी या फरवरी में।