व्रत कथा · भगवान विष्णु

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले कि इसका नाम वरूथिनी है, यह सौभाग्य देने वाली और लोक-परलोक में रक्षा करने वाली है, और उन्होंने यह कथा सुनाई।

प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर राजा मांधाता राज करते थे। वे दानी और धर्मात्मा थे। एक बार वे वन में तपस्या करने गए और ध्यान में लीन होकर खड़े थे। तभी एक जंगली भालू आया और उनका पैर चबाने लगा, फिर उन्हें घसीटकर घने वन में ले गया।

राजा सच्चे तपस्वी थे। उन्होंने क्रोध नहीं किया और भालू पर अपना बल भी नहीं चलाया। पीड़ा में उन्होंने केवल भगवान विष्णु को पुकारा। भक्त की पुकार सुनकर भगवान तुरंत प्रकट हुए और सुदर्शन चक्र से भालू को मार डाला।

तब तक भालू राजा का पैर खा चुका था और मांधाता बहुत दुखी थे। भगवान विष्णु ने कहा, "शोक मत करो। यह कष्ट पिछले जन्म के कर्मों का फल है। मथुरा जाकर मेरे वराह रूप की पूजा करो और वरूथिनी एकादशी का व्रत रखो। उसके प्रभाव से तुम्हारा शरीर फिर पूर्ण हो जाएगा।"

मांधाता ने मथुरा जाकर वराह भगवान की पूजा की और श्रद्धा से वरूथिनी एकादशी का व्रत किया। व्रत के पुण्य से उनका शरीर फिर से पूर्ण और बलवान हो गया। उन्होंने लंबे समय तक सुख से राज किया और अंत में भगवान के धाम को प्राप्त हुए।

श्रीकृष्ण ने कहा कि इस व्रत का फल लंबी तपस्या और बड़े दान से भी बढ़कर है, और जो इसे करता है या इसकी कथा सुनता है, उसकी कवच की तरह रक्षा होती है।

कथा के बारे में

राजा मांधाता की कथा, जिन्हें भगवान विष्णु ने भालू से बचाया और वरूथिनी व्रत से फिर स्वस्थ किया। 'वरूथिनी' का अर्थ है कवच की तरह रक्षा करने वाली। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है; इस कथा में उनके वराह रूप की।

कब पढ़ें या गाएँ

पूर्णिमांत पंचांग में वैशाख कृष्ण एकादशी (अमांत पंचांग में चैत्र कृष्ण एकादशी), अप्रैल या मई में।

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