व्रत कथा · भगवान विष्णु
देवशयनी एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले कि इसे देवशयनी या पद्मा एकादशी कहते हैं, और उन्होंने वह कथा सुनाई जो ब्रह्मा जी ने नारद जी को सुनाई थी।
सतयुग में सूर्यवंश में मांधाता नाम के एक प्रतापी राजा हुए। वे सत्यवादी और न्यायप्रिय थे और उनकी प्रजा सुखी और संपन्न थी। पर एक बार राज्य में किसी दोष के कारण तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। फसलें सूख गईं, अकाल पड़ गया और यज्ञ-पूजन तक रुक गए। दुखी प्रजा राजा के पास पहुँची।
मांधाता समझ नहीं पाए कि किस पाप के कारण प्रजा पर यह संकट आया है। कारण और उपाय जानने के लिए वे कुछ लोगों के साथ वन की ओर चल पड़े। भटकते-भटकते वे ब्रह्मा जी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुँचे। राजा ने प्रणाम करके राज्य का दुःख बताया और पूछा कि वर्षा कैसे लौटे।
ऋषि ने कहा कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पद्मा एकादशी का व्रत पूरी प्रजा के साथ करो, उसके पुण्य से वर्षा अवश्य होगी।
राजा ने लौटकर परिवार और सारी प्रजा के साथ यह व्रत किया। उसके प्रभाव से मूसलाधार वर्षा हुई, धरती फिर हरी-भरी हो गई और राज्य अन्न और आनंद से भर गया।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि इसी एकादशी को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर सोने जाते हैं और चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। ये चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं, जो व्रत, उपवास और भक्ति का समय है। जो श्रद्धा से यह व्रत करता है, वह पापों से छूटकर भगवान की कृपा पाता है।
कथा के बारे में
राजा मांधाता की कथा, जिनका राज्य अंगिरा ऋषि के कहने पर किए गए इस व्रत से तीन वर्ष के अकाल से बचा। इस दिन भगवान विष्णु चार महीनों के लिए क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन करते हैं और चातुर्मास आरंभ होता है। इसे हरिशयनी, पद्मा या आषाढ़ी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है।
कब पढ़ें या गाएँ
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में यही महीना), जून या जुलाई में। इस दिन से देवउठनी एकादशी तक विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं होते।