व्रत कथा · भगवान विष्णु
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले कि इसका नाम पापांकुशा है, क्योंकि यह पाप को वैसे ही रोकती है जैसे अंकुश हाथी को, और इस दिन भगवान विष्णु की पद्मनाभ रूप में पूजा करनी चाहिए। फिर उन्होंने यह कथा सुनाई।
प्राचीन काल में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था। वह अपने नाम की तरह ही क्रूर और हिंसक था। उसने जीवन भर जीवों की हत्या की, राहगीरों को लूटा, मदिरा पी और पाप में डूबा रहा, कभी कोई अच्छा काम नहीं किया।
जब वह बूढ़ा हुआ, तो स्वप्न में यमराज के दूत ने आकर कहा कि कुछ ही दिनों में तेरा जीवन समाप्त होगा और तब यमदूत तुझे दंड के लिए ले जाएँगे। क्रोधन डर से काँपता हुआ जागा। पहली बार उसे अपने कर्मों के फल का भय हुआ।
कहीं और जाने का रास्ता न सूझा तो वह पर्वत पर अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुँचा। ऋषि के चरणों में गिरकर बोला, "मैंने जीवन भर केवल पाप किए हैं और मृत्यु पास है। मुझे यमराज के दंड से बचने का कोई ऐसा उपाय बताइए जिसे मुझ जैसा भी कर सके।"
ऋषि को उस पर दया आई और वे बोले, "आश्विन शुक्ल पक्ष में पापांकुशा एकादशी आती है। श्रद्धा से उसका व्रत करो, भगवान विष्णु की पूजा करो और रात भर जागरण करो। इससे तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो जाएँगे।"
क्रोधन ने ऋषि के बताए अनुसार सच्चे पश्चाताप के साथ व्रत किया। उसके प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो गए। जब उसका अंत समय आया, तो उसे लेने यमदूत नहीं, भगवान विष्णु के पार्षद आए और उसे भगवान के धाम ले गए।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो यह व्रत करता है, वह कभी यमलोक नहीं जाता, और इसका पुण्य मातृपक्ष और पितृपक्ष की दस-दस पीढ़ियों तक पहुँचता है।
कथा के बारे में
विंध्य पर्वत के क्रूर बहेलिये क्रोधन की कथा, जो अंगिरा ऋषि के कहने पर इस व्रत से यमराज के दंड से बचा। 'पापांकुशा' का अर्थ है पाप पर अंकुश लगाने वाली। इस दिन भगवान विष्णु की पद्मनाभ रूप में पूजा होती है।
कब पढ़ें या गाएँ
आश्विन शुक्ल एकादशी (पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में यही महीना), दशहरे के अगले दिन या उसके आसपास, सितंबर या अक्टूबर में।