व्रत कथा · भगवान विष्णु
मोहिनी एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले कि एक बार श्रीराम ने भी दुःखों से छुड़ाने वाले व्रत के बारे में वशिष्ठ मुनि से यही प्रश्न किया था, और उन्होंने वशिष्ठ जी का उत्तर सुनाया।
सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की नगरी थी, जहाँ राजा द्युतिमान राज करते थे। वहाँ धनपाल नाम का एक धनी और धर्मात्मा वैश्य रहता था, जिसने लोगों के लिए कुएँ, धर्मशालाएँ और बाग बनवाए थे। उसके पाँच पुत्र थे। सबसे छोटा धृष्टबुद्धि पिता से बिल्कुल उल्टा था: वह जुआ खेलता, मदिरा पीता, बुरी संगत में रहता और घर का धन उड़ाता।
उसे सुधार न पाने पर धनपाल ने अंत में उसे घर से निकाल दिया और बंधु-बांधवों ने भी उससे मुँह मोड़ लिया। गहने और कपड़े बिक जाने के बाद धृष्टबुद्धि चोरी करने लगा। वह कई बार पकड़ा गया, राजा ने उसे दंड दिया और अंत में नगर से निकाल दिया। वह भूखा-प्यासा वन में भटकता और शिकार करके पेट भरता रहा।
एक दिन संयोग से वह कौंडिन्य ऋषि के आश्रम पहुँचा, जब ऋषि गंगा स्नान करके लौट रहे थे। उनके भीगे वस्त्रों से कुछ बूँदें उस पर पड़ीं और उसी क्षण उसकी बुद्धि बदल गई। वह ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और पापों से छूटने का उपाय पूछने लगा।
कौंडिन्य ऋषि ने कहा कि वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का व्रत करो, यह अनेक जन्मों के पापों को नष्ट कर देती है। धृष्टबुद्धि ने ऋषि के बताए अनुसार व्रत किया। उसके पाप नष्ट हो गए, जीवन बदल गया और अंत में वह गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक को गया।
वशिष्ठ जी ने श्रीराम से कहा कि मोह को मिटाने के लिए तीनों लोकों में इससे उत्तम व्रत नहीं है, और इसकी कथा सुनने से सहस्र गोदान का फल मिलता है। इसी दिन भगवान विष्णु के मोहिनी रूप का भी स्मरण होता है, जो उन्होंने समुद्र मंथन के समय देवताओं को अमृत पिलाने के लिए धारण किया था।
कथा के बारे में
व्यसनों में डूबे वणिक पुत्र धृष्टबुद्धि की कथा, जिसका इस व्रत से उद्धार हुआ, जैसी वशिष्ठ मुनि ने श्रीराम को सुनाई। यह दिन समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु के मोहिनी रूप की भी याद दिलाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है।
कब पढ़ें या गाएँ
वैशाख शुक्ल एकादशी (पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में यही महीना), अप्रैल या मई में।