व्रत कथा · भगवान विष्णु
योगिनी एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण बोले कि इसका नाम योगिनी है, यह बड़े-बड़े पापों को नष्ट करती है, और उन्होंने यह कथा सुनाई।
यक्षों की नगरी अलकापुरी में धन के स्वामी कुबेर राज करते थे, जो भगवान शिव के बड़े भक्त थे। हेममाली नाम का एक यक्ष उनका माली था। वह प्रतिदिन मानसरोवर से ताजे फूल लाता था, जिनसे कुबेर शिवजी की पूजा करते थे। हेममाली की पत्नी बहुत सुंदर थी और वह उससे बहुत प्रेम करता था।
एक दिन हेममाली फूल तो लाया, पर पत्नी के प्रेम में घर पर ही रुक गया और फूल कुबेर तक नहीं पहुँचाए। कुबेर दोपहर तक फूलों की प्रतीक्षा करते रहे। पूजा में देर होने पर उन्होंने सेवकों को कारण जानने भेजा। सेवकों ने बताया कि हेममाली अपनी पत्नी के साथ घर पर है।
कुबेर बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने हेममाली को बुलाकर शाप दिया, "तूने भगवान शिव का अपमान किया है। तुझे कोढ़ हो, पत्नी से तेरा वियोग हो और तू यहाँ से पृथ्वी पर जा गिरे।" उसी क्षण हेममाली पृथ्वी पर गिर पड़ा और उसका शरीर कोढ़ से भर गया।
वह बहुत समय तक पीड़ा में वनों और पर्वतों में भटकता रहा। अंत में किसी पुण्य के प्रभाव से वह हिमालय पर मार्कंडेय ऋषि के आश्रम पहुँचा और उनके चरणों में गिरकर अपना अपराध सच-सच बता दिया। उसकी सच्चाई से प्रसन्न होकर ऋषि बोले, "आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत करो, तुम इस शाप से छूट जाओगे।"
हेममाली ने श्रद्धा से योगिनी एकादशी का व्रत किया। उसके प्रभाव से उसका रोग दूर हो गया, उसे फिर से दिव्य रूप मिला और वह अलकापुरी लौटकर पत्नी के साथ सुख से रहने लगा।
श्रीकृष्ण ने कहा कि इस व्रत का फल अठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है, और यह पाप और रोग दोनों से मुक्त करता है।
कथा के बारे में
कुबेर के माली हेममाली की कथा, जिसे कर्तव्य भूलने पर कोढ़ का शाप मिला और जो मार्कंडेय ऋषि के कहने पर योगिनी एकादशी के व्रत से स्वस्थ हुआ। यह व्रत रोग और पाप दूर करने वाला माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है।
कब पढ़ें या गाएँ
पूर्णिमांत पंचांग में आषाढ़ कृष्ण एकादशी (अमांत पंचांग में ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी), निर्जला और देवशयनी एकादशी के बीच, जून या जुलाई में।